भारतीय ज्ञान परम्परा और आधुनिक विज्ञान का संगम ही शिक्षा का वास्तविक स्वरूप- कुलपति प्रो एन के जोशी
भारतीय ज्ञान परम्परा और आधुनिक विज्ञान का संगम ही शिक्षा का वास्तविक स्वरूप- कुलपति प्रो एन के जोशी
भारतीय ज्ञान परम्परा उत्कृष्टता केंद्र द्वारा व्याख्यानमाला का शुभारम्भ
कुलपति प्रो एन के जोशी ने किया शुभारम्भ
देहरादून।श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परम्परा उत्कृष्टता केन्द्र द्वारा “विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेश” विषय पर व्याख्यानमाला का शुभारम्भ किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो एन के जोशी ने किया। कुलपति प्रो एन के जोशी ने कहा कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की सबसे बड़ी धरोहर उसका ज्ञान-कोष है, जिसमें विज्ञान, गणित, चिकित्सा, खगोल, दर्शन, साहित्य और कला सभी का अद्भुत समन्वय है। प्रो जोशी ने कहा कि आज जब पूरी दुनिया सतत विकास और समग्र शिक्षा की बात कर रही है, तब भारतीय परम्परा प्राचीन काल से ही वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को शिक्षा में समाहित कर चुकी थी। आवश्यकता है कि हम इस धरोहर को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ें ताकि विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के साथ, नैतिकता, व्यवहारिकता और ज्ञान की गहराई से भी समृद्ध हों। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल अतीत का गौरव नहीं है, बल्कि भविष्य का पथप्रदर्शक भी है। आज आवश्यकता है कि हम आयुर्वेद, योग, वास्तुशास्त्र, न्याय-मीमांसा, व्याकरण और साहित्य जैसे विषयों को आधुनिक विज्ञान और तकनीकी विषयों से जोड़ें। यह व्याख्यानमाला इसी दिशा में एक सार्थक कदम है, जिससे शोधार्थियों और विद्यार्थियों को बहुविषयी दृष्टिकोण प्राप्त होगा। उन्होंने केन्द्र की गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा संचालित यह पहल विधार्थियों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगी।
कार्यक्रम संयोजक निदेशक, भारतीय ज्ञान प्रणाली अध्ययन केन्द्र प्रो कल्पना पन्त ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए केन्द्र की स्थापना की पृष्ठभूमि, उद्देश्यों तथा भावी योजनाओं का विस्तृत परिचय दिया। उन्होंने कहा कि हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी इस बात पर बल देती है कि शिक्षा बहुविषयी और समाजोपयोगी हो। भारतीय ज्ञान परम्परा को पाठ्यक्रम में शामिल करने से विद्यार्थी न केवल आधुनिक तकनीक और विज्ञान में दक्ष होंगे, बल्कि अपनी जड़ों से भी जुड़े रहेंगे।
उपनिदेशक प्रो पूनम पाठक ने मुख्य वक्ता का परिचय देते हुए केन्द्र की शैक्षणिक एवं शोधगत गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यह व्याख्यानमाला विद्यार्थियों को भारतीय परम्परा की जड़ों से जोड़ने और नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों को साकार करने में सहायक होगी।
प्रथम व्याख्यान की मुख्य वक्ता डा मनीषा दीपक पुराणिक, एस बी एल सेंटर ऑफ संस्कृत एंड इंडोलॉजिकल स्टडीज़, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, पुणे, महाराष्ट्र रहीं। उन्होंने अपने व्याख्यान में विस्तारपूर्वक बताया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली वास्तव में एक ऐसा समग्र दृष्टिकोण है जो जीवन के हर क्षेत्र को ज्ञान और आचरण से जोड़ता है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा शिक्षा को चरित्र निर्माण और समाजोपयोगी बनाने पर बल देती है। यह आवश्यक है कि पाठ्यक्रम में योग, आयुर्वेद, गणित, खगोल, कृषि, पर्यावरण एवं दार्शनिक चिन्तन जैसे विषयों को समाविष्ट किया जाए। इससे विद्यार्थी न केवल रोजगार के योग्य बनेंगे बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति संवेदनशील भी होंगे। उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली का आशय केवल प्राचीन ग्रंथों, वेदों या शास्त्रों से नहीं है, बल्कि यह भारत की उस समग्र परम्परा से है जो हजारों वर्षों से विज्ञान, दर्शन, कला, गणित, चिकित्सा, खगोल, समाज और संस्कृति को दिशा देती आई है। यह शिक्षा को अधिक समग्र, मूल्यपरक और समाजोपयोगी बनाने का प्रयास है। भारतीय ज्ञान परम्परा को सभी विषयों में सहज रूप से जोड़ा जा सकता है जिससे प्रत्येक विषय का पाठ्यक्रम न केवल आधुनिक ज्ञान के अनुरूप रहेगा, बल्कि भारतीय बौद्धिक परम्परा और सांस्कृतिक मूल्यों से भी समृद्ध होगा, जिससे विद्यार्थी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम होने के साथ-साथ अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे।।
आयोजक सचिव डा गौरव वार्ष्णेय ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए भारतीय ज्ञान प्रणाली के महत्व पर अपने विचार रखे और कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति की प्रासंगिकता को समझना आज की शिक्षा नीति का अभिन्न अंग है और यह विद्यार्थियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाएगा।
पण्डित ललित मोहन शर्मा परिसर, ऋषिकेश के निदेशक प्रो एम एस रावत ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यह व्याख्यानमाला केवल शैक्षणिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी उपयोगी है। इससे हमारे विद्यार्थी जड़ों से जुड़े रहकर नई तकनीक और आधुनिक विषयों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकेंगे।
विश्वविद्यालय राष्ट्रीय शिक्षा नीति के समन्वयक प्रो डी सी गोस्वामी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका पर विचार व्यक्त किये
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के डीन, कला संकाय प्रो पी के सिंह, डीन, वाणिज्य संकाय प्रो वी पी श्रीवास्तव, डीन, विज्ञान संकाय प्रो एस पी सती, डीन, छात्र कल्याण प्रो हेमलता मिश्रा, प्रो संगीता मिश्रा, प्रो अधीर कुमार, प्रो दिनेश शर्मा, प्रो स्मिता बडोला, डा शिखा ममगाईं, डा जयप्रकाश तथा प्रदेश के विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्य प्रो आनंद प्रकाश सिंह, प्रो योगेश शर्मा आदि उपस्थित रहे।
